क्या है Mathura के तालवन अतार्थ दाऊजी मंदिर का रहस्य

Mathura को भगवान की कृष्ण की जन्म नगरी के नाम से जाना जाता है। ऐसा कहा जाता है यहां पहले केवल जंगल ही जगल हुआ करते थे। यहां पर  80-57 ईसा पूर्व में पहला मंदिर बनवाया गया। एक शिलालेख पर लिखित अक्षरों से पता चलता है कि इस मंदिर का निर्माण किसी ‘वसु’ नामक व्यक्ति के द्वारा किया गया था। कई वर्षों बाद महराजा विक्रमादित्य के काल में यानी की 800 ईसा पूर्व में दूसरे मंदिर की स्थापना की गई। 

Mathura के राजा थे “राजा कंस” जो भगवान् श्री कृष्ण के मामा थे। उन्होंने अपनी बहन और अपने बहनोई को बंदी बना लिया। इसके पीछे कारण यह था कि एक भविष्वाणी। आकाश से होने वाली इस भाविष्यवाणी में कहा गया कि उनकी बहन यानी की कृष्ण जी की मां देवकी जी के गर्भ से होने वाली आठवीं संतान राजा कंस का विनाश करेगी। 

इसलिए राजा कंस ने अपनी बहन और जीजा को आजीवन कारागार में डाल दिया। जब भगवान् कृष्ण का जन्म हुआ तो वो मथुरा में ही हुआ लेकिन दोनों माता पिता ने अपनी संतान को बचाने के लिए उन्हें गोकुल में छोड़ कर आना पड़ा। लेकिन उनकी जन्मभूमि आज भी Mathura ही कहलाती है।

वराह पुराण एवं नारदीय पुराण के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि मथुरा के पास के 12 वन हुआ करते थे। ये सभी 12  वन इस प्रकार हैं 1. मधुवन, 2. तालवन, 3. कुमुदवन, 3. काम्यवन, 5. बहुलावन, 6. भद्रवन, 7. खदिरवन, 8. महावन (गोकुल), 9. लौहजंघवन, 10. बिल्व, 11. भांडीरवन एवं 12. वृन्दावन है। जिनको लेकर अलग अलग मान्यताएं भी है।

आज के इस लेख में हम तालवन के बारें में आपको जानकारी देने जा रहे हैं, जिसे भगवान् बलराम जी की शक्ति के कारण जाना जाता है।

तालवन की कहानी भगवान बलराम द्वारा एक राक्षस जिसका नाम धेनुकासुर था, उसे मारने के शगल से जुडी है। कुछ समय पहले इस वन में हजारों की संख्या में ताल यानी की ताड़ के वृक्ष थे। पौरानिक कथाओं के अनुसार धेनुकासुर नाम का राक्षस, जो एक गधा दानव था। वह अपने पूरे परिवार के साथ इसी बन में रहकर मीठे और स्वादिष्ट ताल फलों की रक्षा करता था। 

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कई बार भगवान् कृष्ण और बलराम के मित्र फलों की गंध से प्रभावित हुए लेकिन उन्हें खाने के लिए राक्षस से भिड़ने का साहस किसी में न था। जान कृष्ण और बलराम को अपने मित्रों की इच्छा का पता चला और उन्होंने तालवन में प्रवेश करके फल लाने की ठानी। उन्होंने अपने विशाल बल से पेड़ों को हिलाया ताकि फल जमीन पर गिर जाएं। शोर सुनते ही  धेनुकासुर वहां आया और कृष्ण और बलराम को देखते ही गुस्से में आ गया। जैसे ही वो हमला करने के लिए तैयार हुआ अचानक बलराम ने उसके पैरों को पकड़ा और फिर उसके सिर पर गोल गोल घुमाकर उसे फेंक दिया। भगवान बलराम ने धेनुकासुर को ऐसा बलपूर्वक मारा कि उसके प्राण उसके शरीर से निकल गए।

जल्द ही, भाइयों कृष्ण और बलराम द्वारा धेनुकासुर और उसके परिवार की मृत्यु के बाद, चरवाहे लड़कों ने स्वादिष्ट ताल फलों को फिर से ग्रहण किया और उन्हें धन्यवाद दिया। एक छोटा सा मंदिर है जिसे भगवान बलराम को समर्पित स्थान पर बनाया गया है जिसका नाम दाऊजी मंदिर है।

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