Sabarimala: भारत का सबसे अद्वितीय मंदिर और इसकी तीर्थ यात्रा

Sabarimala: भारत में बहुत सी धार्मिक यात्राएं प्रसिद्ध हैं, अमरनाथ यात्रा, चार धाम यात्रा ऐसे ही एक यात्रा पूरे देश में बहुत अधिक लोकप्रिय है जो भारत के साउथ में अपना अलग ही महत्व रखती है। इसे सबरीमाला कहा जाता है। कुछ समय पहले तक Sabarimala में महिलाओं का प्रवेश निषेध था। लेकिन हाल ही में  भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के लिए आयु प्रतिबंध हटा दिया था। यह बेहद ही ऐतिहासिक फैसला था, अब प्रतिबन्ध हटते ही यहां महिलाओं की भीड़ भी बढ़ने लगी है। सबसे बड़ी बात तो ये है कि यहां महिलाएं बड़ी संख्या में भाग ले रही हैं। इस मंदिर के खुलने का समय भी निश्चित है जो केवल मलयालम महीने के पहले दिन के लिए खुलता है।

यह मंदिर तकरीबन 800 साल पुराना है, किस्में तभी से यह मान्यता चली आ रही थी कि इस मंदिर में महिलाओं को प्रवेश न दिया जाए। लेकिन अब इतिहास बदल चुका है चलिए विस्तार से जानते है मंदिर के बारें में …….

कौन है भगवान अयप्पा

ऐसा कहा जाता है कि भगवान अयप्पा शिव की ही संतान है जो समुन्द्र मंथन के दौरान विष्णु के रूप पर भगवान मोहित हो गए जिससे प्रभाव से एक संतान की उत्पति हुई। जिसे अब लोग अयप्पा के नाम से जानते हैं।  Sabarimala में पीठासीन देवता का मिथक पंडालम राजवंश से जुड़ा हुआ है जो पांड्या वंश से अलग होने के बाद पठानमथिटा के वर्तमान हिस्सों में बस गए थे। पंडालम के राजा और रानी को संतानहीन माना जाता था।

कहानी यह है कि जब राजा एक दिन शिकार करने गया, तो उसे एक जंगल में नदी के किनारे एक रोता हुआ बच्चा मिला, जो असल में भगवान अयप्पा थे। पूछताछ करने पर, एक ऋषि ने राजा को बच्चे को घर ले जाने और उसे अपने बेटे के रूप में लाने की सलाह दी, जिसे राजा ने अंततः किया। बच्चे का नाम मणिकंदन रखा गया और वह बड़ा होकर पंडालम का राजकुमार बन गया।

जब मणिकंदन 12 वर्ष के थे, तो पंडालम की रानी ने एक अचानक बीमारी हो गई और रानी का इलाज करने वाले चिकित्सक ने शेरनी के दूध लाने को कहा कि अब तरह से बचाया जा सकता है। जबकि हर कोई जंगल से शेरनी के दूध लाने से डरता था। तब मणिकंदन ने स्वेच्छा से ऐसा करने का निर्णय लिया। वह अंततः न केवल दवा लाता है, बल्कि खुद एक शेरनी की सवारी करता है। राजा ने कहा कि उनके दत्तक पुत्र के साथ निर्वासित हो गए, उन्हें एहसास हुआ कि वह कोई साधारण बच्चा नहीं है।

विद्या के अनुसार, मणिकंदन राज्य और सभी भौतिक संपदा को त्यागने और तपस्वी बनने की इच्छा व्यक्त करता है। बाद में राजा अपने बेटे के लिए एक मंदिर बनाता है, 30 किलोमीटर दूर एक पहाड़ी के ऊपर जो आखिर में Sabarimala बन गई।

Sabarimala-tample

Sabarimala तीर्थ का महत्व 

भारत के बाकी हिंदू मंदिरों की तरह Sabarimala साल भर नहीं खुलता है। इसके खुलें का विशेष समय सुनिशिचित किया गया है। इस मंदिर के खुलें का समय मलयालम कैलेंडर है जिसमें ये भक्तों के लिए मलयालम कैलेंडर में हर महीने के पहले पांच दिनों के लिए ही खुलता है। इसके अलावा यह केवल मध्य नवंबर से मध्य जनवरी के बीच होने वाले वार्षिक मंडलम’और मकारविलाकु’ उत्सव के  दौरान ही खुलता है।

ऐसा माना जाता है कि यह दुनिया के सबसे बड़े तीर्थों में से एक है। इस मंदिर में दक्षिण एशिया के राज्यों से लाखों लोग पूजा करने के लिए Sabarimala पहुंचते हैं। सबसे ज्यादा तीर्थयात्री ’मंडलम’ और मकारविलाकु’ उत्सवों के दौरान ही यहां पहुंचते हैं और इसके बाद  वो सभी अगले 41 दिनों तक कठोर व्रत भी करते हैं। इस दौरान, भक्त केवल काले या गहरे नीले रंग के कपडे सकता है, और एक-दूसरे को स्वामी ’के रूप में संबोधित करना भी जरुरी है। इसमें वो लोग  हर रोज पूजा करते हैं। उन्हें मांसाहारी भोजन, शराब जैसी चीजों से दूर रहना होता है और इसमें नंगे पैर ही रहा जाता है। हालांकि, सभी के लिए मंदिर में प्रार्थना करने के लिए ’व्रतम’ का पालन करना जरुरी नहीं है। 

Sabarimala-jourey

अदभुत है यहां कि परम्परा

इस मंदिर में आने वाले श्रद्धालु के सिर पर गठरी रखकर आने की परम्परा है। वो अपने सर पर  एक पोटली रखते हैं जिसमें नैवेद्य होते हैं जो पुजारी दवारा दी जाती हैं। इस पोटली में भगवान को अर्पित की जाने वाली चीजें प्रसाद के रूप में दी जाती हैं। ऐसी मान्य है कि जो भी व्यक्ति तुलसी या रुद्राक्ष की एक माला पहनकर, व्रत और सिर पर नैवेद्य रखकर इस मंदिर में पहुंचता है, उसकी सभी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं।

One thought on “Sabarimala: भारत का सबसे अद्वितीय मंदिर और इसकी तीर्थ यात्रा

  • September 2, 2019 at 4:50 pm
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