Bollywood Entertainment News: समाज में फैली सांप्रदायिकता की गंदगी को आईना दिखाती है, फिल्म Article 15

Bollywood Entertainment News: ‘औकात वही है जो हम देते हैं’। सदियों पुराने वर्ग और जाति और लिंग विशेषाधिकार का अनुकरण करने वाले एक आदमी द्वारा बोली जाने वाली यह पंक्ति हमें आधुनिक भारत की गहरी ख़ामियों का आयना दिखाती है। जहाँ एक तरफ इस आज़ाद देश में आधुकनिकता का बोलबाला है, वहीं दूसरी तरफ भारत में एक अलग ही duniya बस्ती है। जैसा समाज का दिखा दिया वो उसने मान लिया। सच्चाई कहां गई, वो तो रह गई ना कहीं पीछे छिपी, जिसकी भनक सरकार के मंत्री से लेकर बड़ी ऊँची जाति के लोग सामने ही नहीं आने देते। कहते हैं समाज में तालमेल रखने के लिए देश में क़ानूनों का पालन किया जाता है। ये उसी किताब की नहीं चलने देते, जिसे उठाकर उसकी शपथ लेते हैं। ये डायलॉग एकदम सही कहा गया है।

क्या कानून का यह पाठ केवल कहने के लिए है, क्योंकि यहां करनी तो आपको अपने मन की है। यही तो लड़ाई है, इस किताब की चलानी पड़ेगी, क्योंकि उसी से देश चलेगा। अगर ऐसा नहीं हुआ तो ये जाति, लिंग और धर्म के नाम पर होने वाले घिनोना खेल देश को अंदर से खोखला कर देगा। इसलिए समाज के लोगों को समाज में फैली गंदगी से परिचित करवाना होगा, और देश के उन लोगों को कानून सिखाना होगा, जो असल में कानून के नाम पर खुद ही कानून तोड़ते हैं। फिल्म Article 15 के निदेशक अनुभव सिन्हा ने अपनी फिल्म के जरिए इस बुराई को समाज के सामने लाने का प्रयास किया है।

Article 15 Movie Review in Hindi:

हम पूछते हैं, आप होते कौन हो किसी को उसकी औकात दिखाने वाले। आप ना ही कानून हैं और ना ही भगवान। जब आपको कोई अधिकार नहीं तो क्यों समाज में ऐसी गंदगी फैलाई जा रही हैं, जहां इंसानियत को छोड़ जाति और धर्म के नाम पर आपस में भेदभाव किया जा रहा है। अयान रंजन (आयुष्मान ख़ुराना) जो एक आईपीएस अधिकारी है, उसे मध्यप्रदेश के लाल-गांव पुलिस स्टेशन का चार्ज दिया जाता है। जब वो यहां आता है तो एक ऐसी घटना उसके सामने आती है, जिससे बाद वो उस घटना के सवालों में पूरी तरह से उलझ गया है। वो गहन सोच में है कि जैसी दुनिया उसने देखी थी, ये दुनिया उस से पूरी विपरीत है।

Article-15-Movie-Review

अभी वो माहौल  में पूरी तरह से ढला भी नहीं था कि उसे पता चलता है कि फ़ैक्टरी में काम करनेवाली 3 लड़कियाँ जो कि एक दलित परिवार से हैं 3 दिन से गायब हैं  और किसी ने इस बात की रिपोर्ट भी नहीं की। इसकी जांच के लिए जब आयन स्टेशन में काम करनेवाले अधिकारिओं से पूछता है तो उसे पता चलता है कि इस शहर में ऐसा होता है। लड़कियाँ अपने प्रेमियों के साथ भाग जाती हैं और अगर वो मिल जाएं तो माता-पिता उन्हें मार देते हैं, जिसे हम लोग ऑनर किलिंग कहते हैं। केस में मोड़ आता है, जब आयन को 2 दलित लड़कियों की लाश पेड़ पर लटकी मिलती है।

केस के छानबीन से दलित लड़की गौरा (सयानी गुप्ता) और गांव वालों की बातों से इतना ज़रूर समझ आ जाता है कि कुछ है जो उससे छिपाया जा रहा है, इस केस की सच्चाई कुछ अलग है। इस केस का सबसे अहम हिस्सा झकझोर कर रख देने वाला है, जब आयन को पता चलता है कि महज ३ रुपए के लिए लड़कियों का रेप करके मारा गया है। इस बात की तह में जाने के बाद उसे समाज में जाती के नाम पर फैलाई गई गंदी सच्चाई को सामने लाने की जंग शुरू हो जाती है।

फिल्म की कहानी सच में सोचने पर मजबूर कर देती है। समाज में जाती के नाम पर फैले इस घिनोने खेल का पर्दाफ़ाश निर्देशक ने बहुत ही रियलिस्टिक तरीके से किया है। आयुष्मान ख़ुराना जो कि हमेशा ही कुछ अलग करते हैं, इस बार भी वो अपने ला-जवाब अभिनय से सब का दिल जीत लेते हैं। उन्होंने अपने किरदार को पूरी तरह से फिल्म में उतारा है। इस फिल्म के कुछ सिनेमटोग्राफी दृश्य जैसे फाँसी देकर पेड़ पर लटकाना, खेतों में जाकर लड़कियों को ढूंढना, आपको विचलित कर देंगे। कहानी में नयापन है, और देश की अंदर की सच्चाई को दिखाती है। पूरी तरह से फिल्म देखने लायक है।

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